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बिजली कर्मचारियों का हल्ला बोल: निजीकरण के खिलाफ 250 दिन से संघर्ष जारी

News Desk
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04 Aug 2025
02:23 AM
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बिजली कर्मचारियों का हल्ला बोल: निजीकरण के खिलाफ 250 दिन से संघर्ष जारी


>उत्तर प्रदेश में बिजली कंपनियों के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इस कदम को एक "आर्थिक घोटाला" करार दिया है और इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की है। समिति ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की है।


>विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने आरोप लगाया है कि पावर कारपोरेशन प्रबंधन ने जानबूझकर बिजली कंपनियों को घाटे में दिखाया है ताकि निजीकरण का रास्ता साफ हो सके। संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने कहा कि बिजली कंपनियों की संपत्तियों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया है और जिस स्टैंडर्ड बिडिंग डाक्यूमेंट (SBD) के आधार पर RFQ (रिक्वेस्ट फॉर क्वालिफिकेशन) तैयार किया गया, उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के मानकों का उल्लंघन करती है।


>संघर्ष समिति का आरोप है कि घाटे के आंकड़ों में सरकारी सब्सिडी और राजस्व बकाया को भी शामिल किया गया है, ताकि निजीकरण के तर्क को मजबूती मिल सके। इसके अलावा, समिति ने आरोप लगाया है कि निजीकरण के लिए नियुक्त सलाहकार ने फर्जी हलफनामा देकर खुद को योग्य बताया, जो नियमों के खिलाफ है।


>उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस मुद्दे पर एक और चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि बिजली कंपनियों का सरकार पर कुल 15,569 करोड़ रुपये का बकाया है। उनका कहना है कि अगर सरकार इस बकाए को चुका दे और उपभोक्ताओं से लगभग 1,15,000 करोड़ रुपये की वसूली कर ले, तो बिजली कंपनियां फायदे में आ जाएंगी और निजीकरण की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।


>आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा सरकारी बकाया दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम (5,398 करोड़), पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम (3,193 करोड़), मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (3,895 करोड़), पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम (1,832 करोड़) और केस्को कानपुर (1,250 करोड़) पर है। वर्मा ने सवाल उठाया है कि जब बिजली कंपनियों के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आईएएस अधिकारी हैं, तो वे सरकारी विभागों से ही बकाया क्यों नहीं वसूल पा रहे हैं?


>विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इस मुद्दे को केवल एक नीतिगत फैसला मानने से इनकार किया है और इसे एक बड़ा आर्थिक घोटाला बताया है। समिति ने मांग की है कि मुख्य सचिव बतौर एनर्जी टास्क फोर्स के अध्यक्ष इस मामले पर स्वयं संज्ञान लें और जांच कराएं।


>सोमवार को इस आंदोलन के 250 दिन पूरे होने पर, समिति ने पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन कर निजीकरण के खिलाफ अपनी आवाज को और बुलंद करने का फैसला किया है।

 

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