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16 दिनों में 28 BLO की मौत - राजस्थान से बंगाल तक क्यों भड़का सियासी तूफान

India News: देश के 12 राज्यों में मतदाता सूची के SIR अभियान के दौरान बीते 16 दिनों में लगभग 28 बीएलओ की जानें गईं कुछ हार्ट अटैक की शिकार, कुछ आत्महत्या के कारण। अब यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग-निर्देशित इस अभियान ने राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक एक तीव्र राजनीतिक संग्राम का रूप ले लिया है।
News Desk
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20 Nov 2025
06:11 PM
1 min read
16 दिनों में 28 BLO की मौत - राजस्थान से बंगाल तक क्यों भड़का सियासी तूफान
हाइलाइट्स
India News: देश के 12 राज्यों में मतदाता सूची के SIR अभियान के दौरान बीते 16 दिनों में लगभग 28 बीएलओ की जानें गईं कुछ हार्ट अटैक की शिकार, कुछ आत्महत्या के कारण। अब यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि भारतीय चुनाव आयोग-निर्देशित इस अभियान ने राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक एक तीव्र राजनीतिक संग्राम का रूप ले लिया है।


>देश में मतदाता सूची को अद्यतन करने के लिए शुरू किया गया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन इन दिनों एक बड़े विवाद का केंद्र बन गया है। 4 नवंबर से शुरू हुए इस अभियान का उद्देश्य वोटर लिस्ट को त्रुटिहीन बनाना था, लेकिन पिछले 16 दिनों में कई राज्यों में बीएलओ / बूथ लेवल ऑफिसर की मौतों ने इसे राजनीतिक तूफ़ान में बदल दिया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल में बीएलओ कभी हार्ट अटैक तो कभी आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं। इन्हीं घटनाओं के बाद ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर सीधा आरोप लगाया कि अमानवीय दबाव बीएलओ की मौतों की वजह बन रहा है।


>कौन होते हैं बीएलओ और क्या होती हैं उनकी ज़िम्मेदारियाँ ?


>बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर चुनाव आयोग की वह कड़ी हैं, जो सीधे मतदाताओं से जुड़कर वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करते हैं। अधिकतर बीएलओ स्कूल शिक्षकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, क्लर्कों या अन्य सरकारी कर्मचारियों में से नियुक्त किए जाते हैं। इनका मुख्य काम होता है:-


    >
  • घर-घर जाकर वोटरों का सत्यापन

  • नए मतदाताओं के नाम जोड़ना

  • मृत या स्थानांतरित लोगों के नाम हटाना

  • वोटर कार्ड सुधार

  • चुनाव से पहले वोटर स्लिप वितरण


>खास बात यह है कि बीएलओ सालभर काम करते हैं, लेकिन SIR के दौरान काम कई गुना बढ़ जाता है।


>2025 में SIR को 12 राज्यों में एक महीने की सख्त समयसीमा के भीतर पूरा करने का आदेश दिया गया। करीब 1,000–1,200 घरों की जिम्मेदारी एक बीएलओ पर डाल दी गई। तकनीकी खामियाँ, ऐप पर डेटा अपलोड में दिक्कतें, लोकल चुनाव और रेगुलर दफ्तर का काम यह सब कारणों को बीएलओ की मौत से जोड़ कर देखा जा रहा है।


>मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक 7 बीएलओ की मौतें आधिकारिक रूप से सामने आई हैं, जबकि ममता बनर्जी का दावा है कि यह आंकड़ा 28 तक पहुँच चुका है।


>1. गुजरात – हार्ट अटैक


>कपड़वंज के स्कूल प्रिंसिपल रमेशभाई परमार की बीएलओ  ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक से मौत हो गई। 


>2. पश्चिम बंगाल – आत्महत्या और स्ट्रोक


    >
  • जलपाईगुड़ी में शांतिमणि इक्का ने आत्महत्या की।

  • पूर्व बर्दवान में एक महिला बीएलओ  का ब्रेन स्ट्रोक से निधन हुआ।


>3. मध्य प्रदेश – तनाव में मौत


>उदयगढ़ में बीएलओ  भुवान सिंह चौहान निलंबन के बाद तनाव में रहे और उनकी अचानक मौत हो गई।


>4. राजस्थान – हार्ट अटैक और आत्महत्या


    >
  • सवाई माधोपुर में बीएलओ  हरिओम बैरवा को अधिकारी का फोन आने के कुछ ही मिनट बाद हार्ट अटैक आया।

  • धर्मपुरा के बीएलओ  मुकेश जांगिड़ ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी।


>5. केरल – आत्महत्या


>अनीश जॉर्ज ने कथित रूप से काम के बढ़ते बोझ के चलते आत्महत्या कर ली।


>मामला राजनीतिक कैसे बन गया?


>बीते दिनों राजस्थान, बंगाल और केरल में बीएलओ संगठनों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए। वहीं ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर कठोर आरोप लगाते हुए कहा जो काम 3 साल में होता था, उसे चुनाव से पहले 2 महीने में निपटाने का दबाव डाला जा रहा है। दूसरी तरफ बीजेपी का कहना है कि SIR से फर्जी और घुसपैठिए वोटरों की पहचान हो रही है, इसलिए टीएमसी इसे रोकना चाहती है। तो वही टीएमसी आरोप लगाती है कि असली गरीब और आदिवासी वोटरों के नाम ही काटे जा रहे हैं, जो बीजेपी की रणनीति है। यानी, बीएलओ की मौतें अब दलों के बीच राजनीतिक हथियार बन चुकी हैं।


>20 नवंबर 2025 तक चुनाव आयोग ने बीएलओ की मौतों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। आयोग ने ममता बनर्जी के 28 मौतों संबंधी बयान पर भी और आधिकारिक रूप से बयां नहीं दिया है। इस कारण ये विवाद और गहरा गया है और बीएलओ  की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और कार्यभार को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

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