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नई पीढ़ी तक बौद्ध विरासत पहुंचाने की पहल, अम्बेडकरनगर में शुरू हुआ 'बोधि-पथ'

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान की ग्रीष्मकालीन कार्यशाला में बौद्ध दर्शन, पालि भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर दिया गया जोर
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Bureau News Desk
23 Jun 2026
01:28 PM
1 min read
नई पीढ़ी तक बौद्ध विरासत पहुंचाने की पहल, अम्बेडकरनगर में शुरू हुआ 'बोधि-पथ'
हाइलाइट्स
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान की ग्रीष्मकालीन कार्यशाला में बौद्ध दर्शन, पालि भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर दिया गया जोर

 

अम्बेडकरनगर, रवि दुबे। बदलते समय के साथ परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती माना जाता है। इसी दिशा में अम्बेडकरनगर में मंगलवार को एक ऐसी पहल की शुरुआत हुई, जिसका उद्देश्य केवल एक कार्यशाला आयोजित करना नहीं, बल्कि युवाओं को बौद्ध दर्शन, पालि भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना है। 'बोधि-पथ' नाम से शुरू हुई यह ग्रीष्मकालीन कार्यशाला अकबरपुर स्थित बी.एन.के.बी. पी.जी. कॉलेज में प्रारंभ हुई, जहां शिक्षाविदों, विषय विशेषज्ञों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली।

 

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ द्वारा आयोजित इस जनपद स्तरीय कार्यशाला का उद्देश्य बौद्ध धर्म-दर्शन, संस्कृति, शिक्षा और पालि भाषा के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देना है। कार्यशाला का उद्घाटन मुख्य अतिथि बाबा बरुआ दास जी, प्राचार्य, पी.जी. कॉलेज, परुइया आश्रम ने किया। कार्यक्रम में प्रो. अरविंद वर्मा और डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 

 

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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं बी.एन.के.बी. पी.जी. कॉलेज की प्राचार्य प्रो. शुचिता पांडे ने कहा कि 'बोधि-पथ' बौद्ध धर्म-दर्शन, संस्कृति, शिक्षा और पालि भाषा के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

 

मुख्य अतिथि बाबा बरुआ दास जी ने अपने संबोधन में कहा कि 'बोधि-पथ' केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि बौद्ध दर्शन की उस ज्योति को पुनः प्रज्ज्वलित करने का माध्यम है, जो वर्तमान समय में शांति और विवेक का मार्ग दिखाती है।

 

विशिष्ट अतिथि प्रो. अरविंद वर्मा ने युवाओं को बौद्ध दर्शन और नैतिक मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं विषय विशेषज्ञ डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी ने आधुनिक संदर्भों में बौद्ध इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन की आवश्यकता को रेखांकित किया।

 

कार्यशाला संयोजक डॉ. शशांक मिश्र ने कहा कि यह आयोजन बौद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है। उद्घाटन समारोह में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, प्राध्यापकों और कर्मचारियों ने भागीदारी की।

 

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