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एक धोती, 154 बीघा जमीन और 162 साल पुरानी आस्था... अम्बेडकरनगर का वह शिवधाम, जहां आज भी श्रद्धा सुनाती है चमत्कार की कहानी

कहते हैं, एक साधु की परीक्षा लेने निकले तालुकदार को ऐसा उत्तर मिला कि 154 बीघा जमीन दान करनी पड़ी। यह कथा इतिहास के दस्तावेजों में नहीं, लेकिन पीढ़ियों से लोगों की स्मृतियों और आस्था में जीवित है। आज उसी स्थान को दुनिया शिवबाबा धाम के नाम से जानती है।
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Bureau News Desk
13 Jul 2026
04:16 PM
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एक धोती, 154 बीघा जमीन और 162 साल पुरानी आस्था... अम्बेडकरनगर का वह शिवधाम, जहां आज भी श्रद्धा सुनाती है चमत्कार की कहानी
इमेज सोर्स - संवाददाता रवि दुबे
हाइलाइट्स
अम्बेडकरनगर का शिवबाबा धाम करीब 162 वर्ष पुराना धार्मिक एवं आस्था का केंद्र माना जाता है।
धाम की स्थापना से जुड़ी 154 बीघा भूमि की लोकमान्यता आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है।
सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां जलाभिषेक के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पिछले 24 वर्षों से महाशिवरात्रि से पहले यहां नौ दिवसीय श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

अम्बेडकरनगर। सावन की पहली फुहार पड़ते ही अम्बेडकरनगर के अयोध्या-अकबरपुर मार्ग पर स्थित शिवबाबा धाम की तस्वीर बदलने लगती है। भोर की पहली किरण के साथ घंटियों की गूंज, "हर-हर महादेव" के जयघोष, कांवड़ियों की कतारें और जलाभिषेक के लिए बढ़ते कदम इस प्राचीन धाम को जीवंत कर देते हैं। दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास, परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था का संगम है।

लेकिन इस धाम की पहचान केवल इसकी धार्मिक महत्ता तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी पहचान वह कथा है, जिसे यहां का लगभग हर बुजुर्ग सुनाता है। यह एक साधु, एक तालुकदार और 154 बीघा जमीन की कहानी है—एक ऐसी लोकमान्यता जिसने इस स्थान को पूर्वांचल के प्रमुख शिवधामों में शामिल कर दिया।

स्थानीय परंपराओं के अनुसार वर्ष 1864 में देवरिया निवासी शिव प्रसाद तिवारी अयोध्या की यात्रा पर निकले थे। यात्रा के दौरान उन्होंने सीहमई कारीरात गांव के समीप एक पोखरे के किनारे रात बिताई। अगले दिन क्षेत्र के तत्कालीन तालुकदार ने उनसे परिचय पूछा और स्वयं को ब्राह्मण बताने पर उनकी परीक्षा लेने का निर्णय किया।

लोकमान्यता के अनुसार तालुकदार ने कहा कि यदि वे सच्चे ब्राह्मण हैं तो स्नान के बाद अपनी धोती बिना किसी सहारे आकाश में सुखाकर दिखाएं। शिव प्रसाद तिवारी ने चुनौती स्वीकार की, लेकिन इसके साथ एक शर्त भी रखी—धोती जितनी भूमि का चक्कर लगाएगी, उतनी जमीन उन्हें दान करनी होगी।

कहा जाता है कि अगले दिन स्नान के बाद जब धोती आकाश में छोड़ी गई, तो उसने लगभग 154 बीघा क्षेत्र का चक्कर लगाया और फिर वापस वहीं आकर ठहर गई। इस घटना से प्रभावित होकर तालुकदार ने अपना वचन निभाया और पूरी भूमि दान कर दी। इस घटना के स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह कथा आज भी स्थानीय लोकविश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भूमि मिलने के बाद शिव प्रसाद तिवारी ने इसी स्थान को अपनी तपोभूमि बनाया। पूजा, साधना और आध्यात्मिक जीवन का क्रम यहीं से शुरू हुआ। वर्ष 1869 में उन्होंने इसी स्थान पर समाधि ली। समय के साथ यहां भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाओं की स्थापना हुई और धीरे-धीरे यह स्थान शिवबाबा धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

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आज सावन और महाशिवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। सोमवार और शुक्रवार को विशेष भीड़ रहती है। कई परिवार विवाह जैसे शुभ कार्यों से पहले यहां दर्शन करना परंपरा मानते हैं, जबकि मनोकामना पूरी होने पर नई फसल अर्पित करने की परंपरा भी वर्षों से निभाई जा रही है।

धाम के पुजारी ओमप्रकाश गोस्वामी के अनुसार पिछले 24 वर्षों से महाशिवरात्रि से पहले नौ दिवसीय श्रीराम कथा का आयोजन लगातार हो रहा है। वहीं पूरे सावन माह में जनसहयोग से भंडारा चलता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं।

शिवबाबा धाम की सबसे बड़ी ताकत इसकी इमारत नहीं, बल्कि वह लोकविश्वास है जिसने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है। इतिहास अपनी जगह है, लेकिन इस धाम की पहचान उन लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से भी बनती है, जो हर वर्ष यहां भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसी विश्वास ने अम्बेडकरनगर के इस धाम को पूर्वांचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में एक विशिष्ट स्थान दिलाया है।

समय के साथ शिवबाबा धाम केवल एक धार्मिक स्थल भर नहीं रहा। यह धीरे-धीरे पूर्वांचल के उन प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल हो गया, जहां श्रद्धा केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन की परंपराओं का हिस्सा बन चुकी है। यहां आने वाले अनेक परिवार विवाह जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत भगवान शिव के दर्शन से करना शुभ मानते हैं। वहीं मनोकामना पूर्ण होने पर नई फसल के रूप में धान और गेहूं अर्पित करने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि दशकों पहले शुरू हुई ये परंपराएं आज भी पहले जैसी ही जीवित हैं। शायद यही कारण है कि समय बदलने के बावजूद इस धाम की पहचान और लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही है।

सावन का महीना शुरू होते ही शिवबाबा धाम का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। सुबह से देर रात तक "हर-हर महादेव" के जयघोष गूंजते हैं। कंधों पर कांवड़ लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें मंदिर की ओर बढ़ती दिखाई देती हैं। जलाभिषेक के लिए आने वाले भक्तों की संख्या इतनी अधिक होती है कि पूरा परिसर भक्ति और उत्साह से भर उठता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार सावन के शुरुआती दिनों से लेकर पंचमी तक लगातार श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर भी यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। शिवबाबा धाम केवल दर्शन-पूजन तक सीमित नहीं है। यहां वर्षों से धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की परंपरा भी लगातार निभाई जा रही है।

धाम के पुजारी ओमप्रकाश गोस्वामी बताते हैं कि पिछले 24 वर्षों से महाशिवरात्रि से दस दिन पहले यहां लगातार नौ दिवसीय श्रीराम कथा का आयोजन किया जाता है। कथा में आसपास के जिलों के अलावा दूर-दराज़ से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

इसके साथ ही पूरे सावन माह में जनसहयोग से भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी इस आयोजन को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक उत्सव का स्वरूप भी देती है।

शिवबाबा धाम की सबसे चर्चित पहचान उस लोककथा से जुड़ी है, जिसमें शिव प्रसाद तिवारी, तत्कालीन तालुकदार और 154 बीघा भूमि का उल्लेख मिलता है। हालांकि इस कथा के स्वतंत्र ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय समाज में यह पीढ़ियों से सुनाई और दोहराई जाती रही है।

इतिहासकार अक्सर लोककथाओं और दस्तावेज़ी इतिहास के बीच अंतर करने की बात करते हैं, लेकिन भारत के अनेक प्राचीन धार्मिक स्थलों की तरह शिवबाबा धाम की पहचान भी लोकस्मृतियों, जनश्रुतियों और आस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह कथा केवल कहानी नहीं, बल्कि इस धाम की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।

अम्बेडकरनगर, अयोध्या, सुल्तानपुर, आजमगढ़, बस्ती और आसपास के कई जिलों से श्रद्धालु वर्षभर इस धाम में पहुंचते हैं। सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों तक पहुंचने की बात स्थानीय स्तर पर कही जाती है। धार्मिक आयोजनों, वर्षों पुरानी परंपराओं और लगातार बढ़ती श्रद्धालुओं की भागीदारी ने शिवबाबा धाम को पूर्वांचल के प्रमुख शिवधामों में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

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